रतलाम। जिला अस्पताल की लचर व्यवस्थाओं और जवाहर नवोदय विद्यालय कालूखेड़ा प्रबंधन के निर्देशों के चलते चयनित विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। कक्षा छठी में प्रवेश के लिए चयनित करीब 40 बच्चों को मेडिकल सर्टिफिकेट और जांच रिपोर्ट के लिए सुबह से शाम तक अस्पताल परिसर में भटकना पड़ा।

सुबह 6 बजे घर से निकले बच्चे और अभिभावक शाम 5 बजे तक भी जरूरी मेडिकल दस्तावेज नहीं प्राप्त कर सके। स्थिति यह रही कि कई बच्चों को खाली पेट घंटों इंतजार करना पड़ा, क्योंकि सोनोग्राफी जांच के लिए उन्हें बिना भोजन के बुलाया गया था। दिनभर की मशक्कत के बाद मीडिया के हस्तक्षेप से ही रिपोर्ट और सर्टिफिकेट मिल सके।

अस्पताल में अव्यवस्था का आलम यह था कि किसी को सही मार्गदर्शन नहीं मिल रहा था। अभिभावकों को अलग-अलग विभागों में भेजा जाता रहा, जिससे उन्हें बार-बार चक्कर लगाने पड़े। कुछ अभिभावकों ने रेड क्रॉस सोसाइटी में 300 रुपए खर्च कर निजी तौर पर सोनोग्राफी करवाई।

मामले में सबसे बड़ा सवाल 9 से 11 वर्ष के बच्चों की एक्स-रे और सोनोग्राफी जांच को लेकर उठ रहा है। अभिभावकों का कहना है कि इतनी कम उम्र में इस तरह की जांच अनावश्यक है और इससे स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है।
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. संध्या बेलसेरे ने भी माना कि इस आयु वर्ग के बच्चों के लिए एक्स-रे और सोनोग्राफी आवश्यक नहीं है और इससे रेडिएशन का खतरा हो सकता है।
उन्होंने बताया कि नवोदय विद्यालय प्रबंधन द्वारा पूर्व सूचना नहीं दिए जाने के कारण अस्पताल में अचानक भीड़ बढ़ गई, जिससे व्यवस्थाएं प्रभावित हुईं।
वहीं विद्यालय प्राचार्य एस.एन. पूरवर का कहना है कि मेडिकल जांच का प्रारूप नवोदय विद्यालय समिति द्वारा तय किया गया है और रिपोर्ट लाना अनिवार्य है, हालांकि देरी होने की स्थिति में अभिभावकों को अतिरिक्त समय दिया जा सकता है।
पूरे घटनाक्रम ने जिला अस्पताल की व्यवस्थाओं और स्कूल प्रबंधन के निर्देशों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अभिभावकों में नाराजगी है कि बच्चों को अनावश्यक जांचों के लिए मजबूर किया गया और पर्याप्त व्यवस्थाओं के अभाव में उन्हें आर्थिक और मानसिक परेशानी झेलनी पड़ी।


