मध्य प्रदेश के आदिवासी अंचल झाबुआ और अलीराजपुर जिलों में लगने वाले भगोरिया मेले ( हाठ)की शुरुआत हो चुकी है. जहां परंपरागत मांदल ( आदिवासी ढोल) की ताल और झूलों से सजे मेले लगते हैं. होली के त्यौहार ठीक पहले लगने वाले यह भगोरिया हाठ अपनी परंपरा और रंग-बिरंगे आदिवासी परिवेश के लिए तो जान ही जाते हैं लेकिन इन मेलों में आदिवासी युवक युवतियों द्वारा अपना जीवन साथी चुनने की अनोखी घटना मेले को प्रदेश और देश में प्रसिद्धी दिला चुकी है।
हालांकि आदिवासी समाज के नेता और विद्वान इसे भगोरिया पर्व का हिस्सा नहीं मानते हैं।
उनके अनुसार भगोरिया विशुद्ध रूप से आदिवासी परंपरा, संस्कृति और आपसी सद्भाव का त्यौहार है. जिसे पूरे आदिवासी अंचल में लगने वाले अलग-अलग मेलों मनाया जाता है

भगोरिया मेलों से क्यों जुड़ा प्रणय निवेदन के पर्व का नाम
भगोरिया मेले का आयोजन आदिवासी अंचल झाबुआ अलीराजपुर, धार और बड़वानी जिलों में होली के त्यौहार के ठीक पहले होता है।
खासकर झाबुआ में लगने वाले भगोरिया मेले का अपना अलग ही क्रेज है. जहां आदिवासी जन, युवक एवं युवतियां एवं बच्चे इस परंपरागत मेले का लुत्फ उठाते हैं. लेकिन इस मेले में आदिवासी युवक युवतियों के मिलने और प्रणय निवेदन स्वीकार हो जाने पर भाग जाने की कई घटनाएं होने के बाद इसे ही भगोरिया मेले की विशेषता मान लिया गया।
आदिवासी मामलों के जानकारी एवं आदिवासी सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए डॉक्टर अभय ओहरी ने बताया कि यह भगोरिया मेले को लेकर सोशल मीडिया और मीडिया में फैली हुई अफवाह मात्र है।
महा जो कुछ प्रेम विवाह या युवक एवं युवतियों के भाग जाने की घटना को भगोरिया पर्व जोड़ देना गलत होगा।
भगोरिया मेला या हाठ की परंपरा करीब 100 वर्ष पुरानी है झाबुआ जिले के गांव भगोर के राजा कुशमल डामोर द्वारा फसल उत्सव के रूप में इन छोटे-छोटे मेलों और हाठ आयोजनों की शुरुआत की गई थी. जिसमें खाने पीने की वस्तुओं और दैनिक उपयोग की वस्तुओं के व्यापार के साथ झूले रेंट आदि मनोरंजन के संसाधनों की व्यवस्था होती थी.आसपास के गांव के सभी आदिवासी परिवार , रिश्तेदार , समाज जन आपस में मिलते जुलते थे।
धीरे-धीरे समय के साथ इसमें भगोरिया मेलों का मूल स्वरूप आज भी वही है. कुछ नौजवान युवक युवतियों द्वारा भाग कर प्रेम विवाह कर लेने की घटनाओं को सोशल मीडिया और अन्य मीडिया माध्यमों में भगोरिया पर्व से जोड़कर देखा गया जिसका नतीजा यह हुआ कि इसे मीडिया में प्रणय पर्व के रूप में दिखाया गया।

क्या है भगोरिया के प्रेम कनेक्शन की कहानी
दरअसल सोशल मीडिया और प्रिंट इलेक्ट्रानिक मीडिया की नजर भगोरिया पर्व पर तब पड़ी जब यहां बड़ी संख्या में सज धज कर में आने वाले युवक युवतियों एवं गीत संगीत की मस्ती की वजह से यह आयोजन अनूठा और अलग दिखाई देता था।
इस मेले के बारे में मीडिया में जो कहानी बताई जाती है वह यह है कि इस मेले में आने वाले युवक एवं युवतियां यदि एक दूसरे को पसंद कर लेते हैं तो वह भाग जाते हैं और बाद में उनके परिवार वाले आपसी चर्चा कर उनका संबंध तय कर देते हैं।
इसके साथ ही शादी का प्रस्ताव रखने की पान खिलाने वाली कहानी भी सोशल मीडिया और मीडिया में वायरल है. जिसके अंतर्गत यदि कोई युवक युवती को पसंद करता है तो वह उसे पान खाने का प्रस्ताव देता है जिसे यदि युवती स्वीकार कर लेती है तो इसे शादी के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेना माना जाता है।
हालांकि आदिवासी समाज के शिक्षित युवा और संगठन के नेता इसे मान्यता नहीं देते हैं. जयस संगठन के अलीराजपुर जिला अध्यक्ष अरविंद कनेश बताते हैं कि भगोरिया मेले को लेकर भ्रामक जानकारी मीडिया और सोशल मीडिया पर पिछ्ले करीब 10 वर्षों से फैलाई जा रही है. होली के त्यौहार के पहले अलग-अलग क्षेत्र में अलग-अलग दिन लगने वाले हाठ को भगोरिया मेला कहा जाता है. क्योंकि इस फसल पर्व के रूप में भी मानते हैं।
इसलिए आदिवासी युवक युवतियों सज धज कर और आदिवासी वाद्य यंत्रों के साथ पारंपरिक नृत्य करते हुए इस मेले का आनंद लेते हैं . होली का डंडा गढ़ जाने के बाद हमारे आदिवासी परंपरा में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है इसलिए प्रेम विवाह कर लेना और शादी की बात पक्की कर लेने जैसी कोई घटना नहीं होती है।
आदिवासी युवा नेता दिनेश माल ने भी बताया कि यह हमारे आदिवासी परंपरा को दूषित करने का प्रयास है कुछ बाहरी लोग मेलों में आकर कोई हरकत करे तो इसे परम्परा नहीं मान लेना चाहिए।

यह है भगोरिया की परम्परा
भगोरिया मेले का आयोजन मुख्य रूप से झाबुआ जिले सहित अलीराजपुर,बड़वानी और धार जिले के कुछ हिस्सों में किया जाता है. यह करीब 115 वर्ष पुरानी परंपरा है. जो भगोर गांव के राजा द्वारा शुरू की गई थी. इन मेलों में लकड़ी के पारंपरिक रेंट -झूले और आदिवासी वाद्य यंत्रों सहित नृत्य की प्रस्तुति के साथ आयोजित होते हैं इसमें लोकल वस्तुओं का व्यापार भी होता है. खासकर आदिवासी महिलाएं और युवतियां आदिवासी वेशभूषा में रंग-बिरंगे वस्त्र पहनकर और चांदी के विशेष गहने पहनकर समूह में इन मेलों में घूमने आती है. क्योंकि यह आयोजन होली के त्यौहार के ठीक पहले होता है इसलिए इन मेलों में होली के रंगों और गैर का आयोजन भी देखा जाता है।



