रतलाम। कलेक्ट्रेट में मंगलवार को आयोजित जनसुनवाई एक बार फिर प्रशासनिक व्यवस्था की परीक्षा बनती नजर आई। दूर-दराज गांवों से पहुंचे गरीब, मजदूर और जरूरतमंद लोग अपनी समस्याओं के समाधान की उम्मीद लेकर पहुंचे, लेकिन कई आवेदकों ने बताया कि शासकीय योजनाओं का लाभ पाने के लिए उन्हें बार-बार आवेदन देने और अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।

जनसुनवाई के दौरान कलेक्ट्रेट परिसर में बड़ी संख्या में लोग अपनी बारी का इंतजार करते दिखाई दिए। खुले परिसर में बैठे कई आवेदकों ने बताया कि सुबह से इंतजार करने के बाद भी उनकी समस्या सुनने में काफी समय लग जाता है। कुछ लोगों ने प्रवेश व्यवस्था और लंबी प्रतीक्षा को लेकर भी असुविधा जताई

मंगलवार को कलेक्टर की उपस्थिति में जनसुनवाई आयोजित की गई थी। अधिक संख्या में आए आवेदनों के कारण अन्य अधिकारियों को भी आवेदन लेने की जिम्मेदारी दी गई। इस दौरान कई आवेदक अपनी समस्या सीधे कलेक्टर के समक्ष रखने की इच्छा जताते नजर आए। कर्मचारियों द्वारा उन्हें संबंधित अधिकारियों के पास भेजा गया।

इसी दौरान एक मजदूर पिता की पीड़ा ने वहां मौजूद लोगों को भावुक कर दिया। उसने बताया कि जन्म से दिव्यांग पुत्र के इलाज में वह पहले ही आर्थिक संकट से गुजर रहा है। अब बेटी की आंखों के इलाज के लिए आर्थिक सहायता की उम्मीद लेकर वह जनसुनवाई में पहुंचा था। आवेदक का कहना था कि आवेदन देने के बाद उसे संबंधित विभाग में भेजा गया और प्रक्रिया पूरी करने को कहा गया। उसने कहा कि हर बार आने-जाने में बस किराया और मजदूरी का नुकसान अलग से उठाना पड़ता है।
जनसुनवाई में मौजूद अन्य लोगों ने भी बताया कि छोटी-छोटी आर्थिक सहायता या योजनाओं के लाभ के लिए कई बार अलग-अलग विभागों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। लोगों का कहना था कि जब सरकार गरीबों और जरूरतमंदों के लिए अनेक योजनाएं चला रही है, तो इन योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक सरल और त्वरित तरीके से पहुंचना चाहिए।
मंगलवार की जनसुनवाई में सामने आए ऐसे कई मामलों ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि गरीब और जरूरतमंद लोगों को योजनाओं का लाभ पाने के लिए आखिर कितने दरवाजे खटखटाने पड़ेंगे। यदि व्यवस्था में और अधिक संवेदनशीलता और तेजी लाई जाए तो जनसुनवाई वास्तव में आमजन की उम्मीद का मंच बन सकती है।


