
आलोट। नगर के जैन पंचायती भवन में शुक्रवार रात्रि आयोजित धर्मसभा में राष्ट्र संत ललित प्रभ सागर जी ने ‘जीने की कला’ विषय पर उद्बोधन देते हुए कहा कि जीवन को रोते हुए नहीं, हंसते हुए जीना ही सच्चा साधन है। उन्होंने कहा कि जो बीत गया उसका शोक करने के बजाय जो उपलब्ध है उसका आनंद लेना सीखें। सुख आए तो मुस्कुरा लें और दुख आए तो उसे भी मुस्कान में टाल दें, यही जीवन का मूलमंत्र है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह की जगह वाह कहना सीखने का आह्वान करते हुए कहा कि जब व्यक्ति जीवन की हर घटना को प्रेमपूर्वक स्वीकार करता है, तब उसका जीवन आनंद से भर उठता है। आज मनुष्य के पास भौतिक सुख तो बढ़े हैं, पर सुकून घटता जा रहा है। पहले साधन कम थे, लेकिन चैन की नींद थी। आज बेडरूम में एसी है, पर दिमाग में हीटर चल रहा है। इसलिए जीवन को भुनभुनाते नहीं, गुनगुनाते हुए जीना चाहिए।
राष्ट्र संत ने कहा कि पत्थर में प्रतिमा छिपी होती है, जरूरत उसे तराशने की है। उसी प्रकार हर मनुष्य के भीतर अपार संभावनाएं हैं। लगन और उत्साह से मिट्टी मंगल कलश बन सकती है और बांस बांसुरी। जीवन ईश्वर का प्रसाद है, इसे प्रेम, आनंद और उल्लास से संवारना चाहिए।
इससे पूर्व डॉ. मुनि श्री शांति प्रिय सागर जी महाराज ने दान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जो दो हाथों से दान देता है, विधाता उसकी झोली हजार हाथों से भरता है। दान समृद्धि का निवेश है, जो कई गुना होकर लौटता है। परोपकार से बड़ा कोई पुण्य नहीं और पीड़ा से बड़ा कोई पाप नहीं। उन्होंने कहा कि धन कमाना बुद्धि का कार्य है, पर उसे योग्य स्थान पर लगाना हृदय का काम है।
संतश्री ने समाज के संपन्न वर्ग से आह्वान किया कि वे केवल संतानों के लिए संपत्ति छोड़ने के बजाय समाज के लिए भी कुछ करें, ताकि उन्हें पीढ़ियां याद रखें। उन्होंने कहा कि जीवन का सार भलाई में है और दूसरों के लिए किया गया सत्कर्म स्वर्गलोक तक पहुंचता है।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। आगामी 8 फरवरी को सीतामऊ में होने वाले प्रवचन-सत्संग में आलोट से भी श्रद्धालु भाग लेंगे। कार्यक्रम का आयोजन खरतर गच्छ संघ आलोट द्वारा किया गया। इस अवसर पर संघ अध्यक्ष सुरेश बांठिया, उपाध्यक्ष राजेंद्र पारीख सहित समाज के प्रबुद्धजन उपस्थित रहे। आभार डॉ. सुनील चोपड़ा ने व्यक्त किया।




